आज का मेरा विषय बहुत ही सोचने लायक विषय है और शायद मैं ही नहीं पूरे भारत इस विषय को सोचने के लिए मजबूर भी होता होगा या हर हिंदुस्तानी के मन में यह विचार तो आता ही होगा कि हां आज जो देश में हो रहा है क्यों हो रहा है किस लिए हो रहा है इसके पीछे कारण क्या है क्या हम विकसित हो रहे हैं या हम पीछे की ओर जा रहे हैं या हम पीछे की ओर धकेले जा रहे हैं हमें नहीं पता हमारा भविष्य क्या है भविष्य जिन चीजों पर होना चाहिए उन चीजों का नामोनिशान आज वर्तमान की सरकार को नजर नहीं आता है और शायद यह मेरे मन मन का भ्रम भी हो सकता है शायद आप मेरे विचारों से सहमत ना हो परंतु आज पूरा हिंदुस्तान एक चिंता में है और एक बैचेनी में है यह इतनी बेचैनी कहां से आई है ?क्या आज 21वीं शताब्दी में यह जानना जरूरी है कि हम किस धर्म से है? किस जात से है ?हमारा रंग क्या है? हमारा व्यवसाय क्या है? हमारा लिंग क्या है? हम कितने पढ़े लिखे हैं?हम कितने ऊंचे बैठने लायक हैं ?हम कितने नीचे रहने लायक है? क्या यह निर्णय आज ही लेना आवश्यक है कि हमारा इतिहास क्या था वह किन कारणों से गलत है किन कारणों से सही है आज जो भी चीज हमारे भारत में है और हमारी संस्कृति का हिस्सा है और वह जो हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है कौन सा हमारे भारत का अंग है कौन सा हमारे भारत का अंग नहीं है यह सारी बातें तो मेरे हिसाब से सिर्फ बंटवारा करा सकती है युद्ध की ओर ले जा सकती है और यह युद्ध किसी और बाहरी ताकत के साथ नहीं बल्कि हमारी अंदरूनी जनता के बीच में ही होगा जिसे गृह युद्ध कहा जा सकता है|
हम आज ऐसे क्यों माहौल बना रहे हैं कि हम आपस में ही जात के नाम पर ,धर्म के नाम पर लड़ते रहे |
हमारे लड़ने के लिए बहुत लड़ाइयां पड़ी है यह लड़ाई लड़नी होगी यह लड़ाई है बेरोजगारी के खिलाफ, लड़ाई होनी चाहिए अत्याचारों के खिलाफ, लड़ाई होनी चाहिए महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ, क्राइम को रोकने के खिलाफ लड़ाई होनी चाहिए और उस अपराध के खिलाफ जो हमारे भारत को कमजोर और खोखला बना रहा है बाहरी दुश्मनों को तो कुछ करना ही नहीं पड़ रहा है क्योंकि हम भारतीय हैं की में ही लड़ जा रहे हैं हम आपस में एक दूसरे के खून के प्यासे हुए जा रहे हैं अब जरूरत नहीं है हमें जात रंग व्यवसाय ऊंच-नीच को लेकर बहस करने की |हमें हमारे एक दूसरे के साथ चलने की जरूरत है वह संविधान के हिसाब से चलने की जरूरत है संविधान ही सर्वोपरि है पहले हमारा राष्ट्र है पहले राष्ट्रवाद है उसके बाद में सब है अगर हम हमारे राष्ट्रवाद से ऊपर हमारी जात को हमारे धर्म को बताते हैं तो हमारे हिंदुस्तान के भविष्य के लिए यह उचित नहीं है हम सब भारतीय हैं हम सब जन गण मन का नारा लगाते हैं हम सब वंदे मातरम का नारा लगाते हैं हम सब जय हिंद का नारा लगाते हैं हमारी भारतीय सेना के अंदर जितने भी जवान हैं इन सब चीजों से ऊपर उठकर ही हमारी रक्षा करते हैं हमारी रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करते हैं अपनी जिंदगी में बहुत सी चीजों को क्या त्याग देते हैं अपने घर को त्याग दें अपने घर से दूर रहते हैं बच्चों से दूर रहते हैं हमें कम से कम उन जवानों का सम्मान करना चाहिए उनके प्यार का सम्मान करना चाहिए|
मेरा मानना तो यही है कि हमें एक दिशा, एक सही दिशा के अंदर गति करनी चाहिए इन सब चीजों के ऊपर किसी भी प्रकार की चर्चा नहीं करनी चाहिए अगर चर्चा का विषय कृषि को ऊपर उठाना किसानों की आत्महत्या को रोकना रोजगार के साधनों का विकास करना नवीनतम नौकरियों का लाना विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी का विकास करना मानव जीवन के स्तर को ऊंचा उठाना कुपोषण के शिकार लोगों को बचाना देश में व्यापक महामारियों से छुटकारा पाना नए प्रयोग करना नई ऊर्जा साधनों का विकास करना होना चाहिए |हम हमारे समाज के अंदर जात पात और धर्म को लेकर के लड़ते रहेंगे तो बाहरी दुश्मन से कब लड़ेंगे और लड़ने की नवीन रणनीति को कब समझेंगे, समझते ही होंगे लेकिन फिर भी हम अंदर से क्यों खोखले होते जा रहे हैं हमें मरहम की जरूरत है दर्द तो हमारे पास बहुत है दर्द भी तो इतने हैं कि जिन की अब तक भरपाई नहीं हुई है फिर भी हम और घाव को लेने की बातें क्यों करते हैं
धन्यवाद
प्रवीण कुमार
जय हिंद
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