Wednesday, 11 July 2018

आज का चिंता का विषय और बेचैनी

आज का मेरा विषय बहुत ही सोचने लायक विषय है और शायद मैं ही नहीं पूरे भारत इस विषय को सोचने के लिए मजबूर भी होता होगा या हर हिंदुस्तानी के मन में यह विचार तो आता ही होगा कि हां आज जो देश में हो रहा है क्यों हो रहा है किस लिए हो रहा है इसके पीछे कारण क्या है क्या हम विकसित हो रहे हैं या हम पीछे की ओर जा रहे हैं या हम पीछे की ओर धकेले जा रहे हैं हमें नहीं पता हमारा भविष्य क्या है भविष्य जिन चीजों पर होना चाहिए उन चीजों का नामोनिशान आज वर्तमान की सरकार को नजर नहीं आता है और शायद यह मेरे मन मन का भ्रम भी हो सकता है शायद आप मेरे विचारों से सहमत ना हो परंतु आज पूरा हिंदुस्तान एक चिंता में है और एक बैचेनी में है यह इतनी बेचैनी कहां से आई है ?क्या आज 21वीं शताब्दी में यह जानना जरूरी है कि हम किस धर्म से है? किस जात से है ?हमारा रंग क्या है? हमारा व्यवसाय क्या है? हमारा लिंग क्या है? हम कितने पढ़े लिखे हैं?हम कितने ऊंचे बैठने लायक हैं ?हम कितने नीचे रहने लायक है? क्या यह निर्णय आज ही लेना आवश्यक है कि हमारा इतिहास क्या था वह किन कारणों से गलत है किन कारणों से सही है आज जो भी चीज हमारे भारत में है और हमारी संस्कृति का हिस्सा है और वह जो  हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है कौन सा हमारे भारत का अंग है कौन सा हमारे भारत का अंग नहीं है यह सारी बातें तो मेरे हिसाब से सिर्फ बंटवारा करा सकती है युद्ध की ओर ले जा सकती है और यह युद्ध किसी और बाहरी ताकत के साथ नहीं बल्कि हमारी अंदरूनी जनता के बीच में ही होगा जिसे गृह युद्ध कहा जा सकता है|
हम आज ऐसे क्यों माहौल बना रहे हैं कि हम आपस में ही जात के नाम पर ,धर्म के नाम पर लड़ते रहे |
हमारे लड़ने के लिए बहुत लड़ाइयां पड़ी है यह लड़ाई लड़नी होगी यह लड़ाई है बेरोजगारी के खिलाफ, लड़ाई होनी चाहिए अत्याचारों के खिलाफ, लड़ाई होनी चाहिए महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ, क्राइम को रोकने के खिलाफ लड़ाई होनी चाहिए और उस अपराध के खिलाफ जो हमारे भारत को कमजोर और खोखला बना रहा है बाहरी दुश्मनों को तो कुछ करना ही नहीं पड़ रहा है क्योंकि हम भारतीय हैं की में ही लड़ जा रहे हैं हम आपस में एक दूसरे के खून के प्यासे हुए जा रहे हैं अब जरूरत नहीं है हमें जात रंग व्यवसाय  ऊंच-नीच को लेकर बहस करने की |हमें हमारे एक दूसरे के साथ चलने की जरूरत है वह संविधान के हिसाब से चलने की जरूरत है संविधान ही सर्वोपरि है पहले हमारा राष्ट्र है पहले राष्ट्रवाद है  उसके बाद में सब है अगर हम हमारे राष्ट्रवाद से ऊपर हमारी जात को हमारे धर्म को बताते हैं तो हमारे हिंदुस्तान के भविष्य के लिए यह उचित नहीं है हम सब भारतीय हैं हम सब जन गण मन का नारा लगाते हैं हम सब वंदे मातरम का नारा लगाते हैं हम सब जय हिंद का नारा लगाते हैं हमारी भारतीय सेना के अंदर जितने भी जवान हैं इन सब चीजों से ऊपर उठकर ही हमारी रक्षा करते हैं हमारी रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करते हैं अपनी जिंदगी में बहुत सी चीजों को क्या त्याग देते हैं अपने घर को त्याग दें अपने घर से दूर रहते हैं बच्चों से दूर रहते हैं हमें कम से कम उन जवानों का सम्मान करना चाहिए उनके प्यार का सम्मान करना चाहिए|

मेरा मानना तो यही है कि हमें एक दिशा, एक सही दिशा के अंदर गति करनी चाहिए इन सब चीजों के ऊपर किसी भी प्रकार की चर्चा नहीं करनी चाहिए अगर चर्चा का विषय कृषि को ऊपर उठाना  किसानों की आत्महत्या को रोकना  रोजगार के साधनों का विकास करना  नवीनतम नौकरियों का लाना विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी का विकास करना  मानव जीवन के स्तर को ऊंचा उठाना  कुपोषण  के शिकार लोगों को बचाना  देश में व्यापक महामारियों से छुटकारा पाना  नए प्रयोग करना नई ऊर्जा साधनों का विकास करना  होना चाहिए |हम हमारे समाज के अंदर जात पात और धर्म को लेकर के लड़ते रहेंगे तो बाहरी दुश्मन से कब लड़ेंगे  और  लड़ने की  नवीन रणनीति को कब समझेंगे, समझते ही होंगे लेकिन फिर भी हम अंदर से क्यों खोखले होते जा रहे हैं हमें मरहम की जरूरत है दर्द तो हमारे पास बहुत है दर्द भी तो इतने हैं कि जिन की अब तक भरपाई नहीं हुई  है फिर भी हम और घाव को लेने की बातें क्यों करते हैं

धन्यवाद
प्रवीण कुमार
जय हिंद

Sunday, 13 May 2018

Cash is a Confidence in a common man's pocket

भारत देश एक प्रगतिशील देश है और इसका नागरिक ही इसकी प्रगतिशीलता का प्रतीक हैं।यह वह नागरिक है जो अपने खून पसीने की कमाई  लघु उद्योग,बड़े उद्योग , कृषि , मजदूरी या नौकरी करके करता है ओर भारत देश की प्रगति में अपना अमूल्य योगदान अपना टैक्स देकर करता है।
परन्तु मेरा विषय भारत देश की प्रगति में उठाया गया एक कदम है जो कि आज की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।ये है भारत देश को cashless  करने का अतःदेश की अर्थव्यवस्था के विकास की ओर  उठाया गया एक कदम जो कि मेरे विचार में सही भी है और गलत भी।जंहा तक शहरी आबादी के क्षेत्र का सवाल है यह बहुत ही सराहनीय कदम है परंतु यही अगर ग्रामीण क्षेत्र की बात की जाए तो बहुत सही निर्णय नहीं है।
Use of ATM machine and Swipe Machine is good in urban area but what about there ,where the people of rural area is having a low literacy ration.people living under basic needs.
Digitalisation एक अच्छा निर्णय है परंतु digitalisation  हमारे भोले भाले ग्रामीण लोगों को ठगने का एक नया उदाहरण भी दे चुका है जोकि है ciber crime जिसे हम शहरी लोग तो समझ पाते है  परन्तु एटीएम बदलने या निरस्त करने के नाम पर ठगा जा रहा है।उनके कजून पसीने की कमाई की कुछ आपराधिक लोगों द्वारा चाट लिया जाता है और जिस पर हमारे digital systems का भी कोई अंकुश नहीं है।ना ही इन अपराधियों को पकड़ने में कोई खास सफलता हमारी पुलिस को मिली है।
बस हम जागरूकता ही फैलाते है ओर कहते है कि अपनी निजी जानकारी किसी को न दे।जागरूकता होना या देना सही है।एक नागरिक को जागरूक होना भी चाहिए ।परन्तु बड़ी बड़ी कंपनियां किस प्रकार से हमारे निजी मोबाइल नंबर को पाती है।जिसका उपयोग वो विभिन कम्पनियो को अपने product का विज्ञापन करने को देती है।क्या इस पर अंकुश नही होना चाहिए।किस तरह आपराधिक लोग अपना काम सफाई से करते है कि हम यह तक नही जान पाते कि ये कंहा से ओर किसने कॉल की है।और ये जो भी मोबाइल नंबर use करते है ये किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर होता है।ऐसा कैसे हो जाता है कि किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर कोई और व्यक्ति सिम कार्ड ले ले।क्या यह सोचने का विषय नहीं है?
हो सकता है मेरे विचार आपको सहमत न कर सके परन्तु जिस Digital cashless economy  की हम बात करते है या हम कदम उठा चुके है उस कदम में भारत के हर एक नागरिक की निजी जानकारी के दुरुपयोग एवं उसकी गाढ़ी कमाई की सुरक्षा भी एक कदम होना चाहिए ओर यह एक कारगर कदम होना चाहिए।
आम आदमी मेहनत मजदूरी कर के अपना गुजारा करता है जंहा इसे अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए कदम कदम पर रुपया की जरूरत होती है।
घर से निकलते ही हमे रुपये के उपयोग को समझना होगा कि यदि एक आम नागरिक अपने घर से किसी दूसरे शहर में जा रहा है तो उसकी पहली जरूरत एक रिक्शा होगी जो digital नहीं उसे रोकड़(cash)चाहिए क्योंकि सभी शहर दिल्ली या मुम्बई जैसे नहीं। है कि हम paytm या अन्य किसी साधन की बात कर सके।फिर एक बस का सफर में भी उसे रोकड़ देना होगा।बस भी digital नहीं है।अगर आप बात करेंगे online ticket booking की तो यह कतई जायज नही।होगा क्योंकि भारत मे सभी नागरिक अभी उतना स्मार्टफोन या internet का उपयोग नहीं कर पाते है। इसी तरह छोटी छोटी जरूरत के लिए cash का होना अत्यावश्यक है।आजकल भारत cashless से ज्यादा less cash की ओर जा रहा है जंहा ATM में भी cash की कमी दिखती है।
आप स्वयं ही विचार करें कि आज के क्या हालात है और हम क्या चाहते है।

धन्यवाद भारत