लाचारी ओर बेबसी का भारत आज 21 वीं सदी में देखने को मिला है। जहां हम विश्व गुरु बनने की बात कहते है ओर दावा करते है हमारे संसाधनों के विकास और समृद्धि की, हमने हर क्षेत्र में तरक्की की है ओर दुनिया के हर कोने में यह प्रशस्ति दर्शाई है। हमने बहुत बड़े बड़े काम किए है ,बड़े बड़े परमाणु हथियारों का विकास किया है ओर हर बार परीक्षण में सफलता प्राप्त की है।हमने मंगल तक जाने की नींव रखी है।
परन्तु
आज जब 2020 में हम नीचे दर्शाई गई तस्वीरों को देखते है तो लगता है के घर के बाहर सिर्फ सफेदी की पुताई हुए है जबकि घर की दीवारें खोखली है।
यह धरातल का सच दर्शाता है ओर बेबसी ओर लाचारी का भारत दिखता है बहुत ज्यादा नहीं बस लाखों की तादाद में मजदूर ओर गरीब वर्ग इस कोरॉना कहर का शिकार हुए है ,बहुत से बच्चो ने बचपन में ऐसा भारत देखा है जो शायद उनकी मनोवृति को विकृत करने के लिए काफी है बहुत सा यूथ यह देखकर रोया है कि सपने में भी जो नहीं सोचा था वह घटित हुआ, पैदल चलत। लोगों ने अपने कन्धों पर अपने ही बच्चों ओर परिवार वालों की लाशों को ढोया है। लाखों लोगों ने अपने घर ओर गांव का सफर पैदल तय किया है जहां उन्हें सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की सुविधा प्रदान नहीं की गई अपितु पुलिस द्वारा उन्हें डंडे मारकर प्रताड़ित भी किया गया।
ओर जो हर पांच साल में हर घर वोट मांगने आ जाने है
उन देश के वफादारों में से कोई भी ऐसा नहीं था जो इनकी सुध लेने पहुंचा हो।
ये वो गरीब मजदूर है को आज के सपनों के भारत का निर्माण करतें है इन्हे किसी राजनीति कि पड़ी नहीं है इन्हे सिर्फ अपने परिवार के दो वक़्त की रोटी का फ़िक्र रहता है ओर शायद ये इतने सबल नहीं है कि किसी का विरोध के सकें।
भूख ओर प्यास ने जिस भारत को झक्जोड़ा है ओर सच्चाई को बाहर लाया है वो हैं हमारे देश का आपदा प्रबंधन पर सवालिया निशान ।
भारत में दुनिया में गिनी जाने वाली बहुत बड़ी रेल सेवा के होते हुवे भी लोगो का यूं हजारों किलोमीटर का सफर पैदल तय करना ओर इस पर भी भूख ओर प्यास की बदहाली में जीना ओर प्रशासन के डंडा झेलना सच में दुखद है।
हम सब को सच में मंथन कि आवश्यकता है।
हमें मंथन करने की आवश्यकता है कि जितने लोग इस महामारी से नहीं मरे वो अनेक दुर्घटनाओं में मरे है।
बहुत से बच्चे भूख से मरे है
मरने वालों के परिजनों ने लाशों को लेकर सफर किया है
बहुत से बच्चो ने अपनी मां को खोया है
क्या इन सब के लिए इस भारत का निर्माण किया था
जनशक्ति हमारे लोकतंत्र की ताकत है ओर आत्मा भी
तो क्या हमने लोकतंत्र की आत्मा को आहत नहीं किया।
क्या कोई भी ऐसा कारगर साधन नहीं था सरकार के पास जो इन सब घटनाओं को रोक सकता या इन्हे मात्र इस लिए छोड़ दिया गया के इन लोगों से किसी प्रकार का रेवेन्यू सरकार को नहीं मिलता या इन्हे किसी प्रकार का बोझ समझकर छोड़ दिया गया हो
या इन लोगों की गिनती कीड़े मकोड़ों में की गई है।
हमें सच में मंथन की आवश्यकता है
सम्पूर्ण देश को मंथन की आवश्यकता है




